किस-किस उम्र में हो सकता है आपका भाग्योदय?

सुख-दुख, सफलता-असफलता, अमीरी-गरीबी को भाग्य से जोड़कर देखा जाता है। सभी लोग जानना चाहते हैं कि हमारा अच्छा समय कब आएगा? कब हमारे पास बहुत सारा पैसा होगा? इन प्रश्नों के उत्तर भृगु संहिता में बताए गए हैं। ये एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें ज्योतिष संबंधी समस्त जानकारियां दी गई हैं। इस संहिता में कुंडली के लग्न के आधार पर भी बताया गया है कि व्यक्ति का भाग्योदय कब हो सकता है...
कुंडली में होते हैं 12 भाव
कुंडली में 12 भाव होते हैं। इन भावों के नाम 12 राशियों के नाम पर ही हैं। ये 12 राशियां हैं मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन। कुंडली का प्रथम यानी पहला भाव जिस राशि का होता है, उसी राशि के अनुसार कुंडली का लग्न निर्धारित होता है। लग्न के आधार पर कुंडलियां भी बारह प्रकार की होती हैं।
अपनी कुंडली के पहले भाव के आधार पर यहां जानिए किस-किस उम्र में आपका भाग्योदय हो सकता है...
मेष लग्न की कुंडली
जिन लोगों की कुंडली मेष लग्न की है, सामान्यत: उनका भाग्योदय 16 वर्ष की उम्र में या 22 वर्ष की उम्र, 28 वर्ष की उम्र, 32 वर्ष की उम्र या 36 वर्ष की उम्र में हो सकता है।

वृष लग्न की कुंडली
जिन लोगों की कुंडली वृष लग्न की है, उनका भाग्योदय 25 वर्ष की आयु, 28 वर्ष की आयु, 36 वर्ष की आयु या 42 वर्ष की आयु में भाग्योदय हो सकता है।

मिथुन लग्न की कुंडली
मिथुन लग्न की कुंडली वाले लोगों का भाग्योदय करने वाली उम्र है 22 वर्ष, 32 वर्ष, 35 वर्ष, 36 वर्ष या 42 वर्ष। इन वर्षों में मिथुन राशि के लोगों का भाग्योदय हो सकता है।

कर्क लग्न की कुंडली
जिन लोगों की कुंडली कर्क लग्न की है, उनका भाग्योदय 16 वर्ष की आयु, 22 वर्ष की आयु, 24 वर्ष की आयु, 25 वर्ष की आयु, 28 वर्ष की आयु या 32 वर्ष की आयु में हो सकता है।

सिंह लग्न की कुंडली
जिन लोगों की कुंडली सिंह लग्न की है, उनका भाग्योदय 16 वर्ष की आयु में, 22 वर्ष की आयु में, 24 वर्ष की आयु में, 26 वर्ष की आयु में, 28 वर्ष की आयु में या 32 वर्ष की आयु में हो सकता है।

कन्या लग्न की कुंडली
कन्या लग्न की कुंडली वाले लोगों का भाग्योदय इन वर्षों में हो सकता है- 16 वर्ष, 22 वर्ष, 25 वर्ष, 32 वर्ष, 33 वर्ष, 35 वर्ष या 36 वर्ष।

तुला लग्न की कुंडली
जिन लोगों की कुंडली तुला लग्न की है, उनके भाग्य का उदय 24 वर्ष की उम्र में हो सकता है। यदि 24 वर्ष की आयु में भाग्योदय न हो तो इसके बाद 25 वर्ष की आयु में, 32 वर्ष की आयु में, 33 वर्ष की आयु में या 35 वर्ष की आयु में भाग्योदय हो सकता है।

वृश्चिक लग्न की कुंडली
वृश्चिक लग्न की कुंडली वाले लोगों का भाग्योदय 22 वर्ष की आयु में, 24 वर्ष की आयु में, 28 वर्ष की आयु में या 32 वर्ष की आयु में हो सकता है।

धनु लग्न की कुंडली
जिन लोगों की कुंडली धनु लग्न की है, उनका भाग्योदय 16 वर्ष की आयु में, 22 वर्ष की आयु में या 32 वर्ष की आयु में हो सकता है।

मकर लग्न की कुंडली
मकर लग्न की कुंडली वाले लोगों का भाग्योदय 25 वर्ष की आयु में या 33 वर्ष की आयु में या 35 वर्ष की आयु में या 36 वर्ष की आयु में हो सकता है।

कुंभ लग्न की कुंडली
जिन लोगों की कुंडली कुंभ लग्न की है, उनका भाग्योदय 25 वर्ष की उम्र में, 28 वर्ष की उम्र में, 36 वर्ष की उम्र में या 42 वर्ष की उम्र में हो सकता है।

मीन लग्न की कुंडली
मीन लग्न की कुंडली वाले लोगों का भाग्योदय 16 वर्ष की आयु में, 22 वर्ष की आयु में, 28 वर्ष की आयु में या 33 वर्ष की आयु में हो सकता है।

पर मै गुरु किसे बनाऊ

एक बार की बात है नारद जी विष्णु जी से मिलने गए ! विष्णु जी ने उनका बहुत सम्मान किया ! जब नारद जी वापिस गए तो विष्णु जी ने कहा हे लक्ष्मी जिस स्थान पर नारद जी बैठे थे ! उस स्थान को गाय के गोबर से लीप दो !
जब विष्णु जी यह बात कह रहे थे तब नारद जी बाहर ही खड़े थे ! उन्होंने सब सुन लिया और वापिस आ गए और विष्णु जी से पुछा हे विष्णु जी जब मै आया तो आपने मेरा खूब सम्मान किया पर जब मै जा रहा था तो आपने लक्ष्मी जी से यह क्यों कहा कि जिस स्थान पर नारद बैठा था उस स्थान को गोबर से लीप दो !
विष्णु जी ने कहा हे नारद मैंने आपका सम्मान इसलिए किया क्योंकि आप देव ऋषि है और मैंने देवी लक्ष्मी से ऐसा इसलिए कहा क्योंकि आपका कोई गुरु नहीं है ! आप निगुरे है ! जिस स्थान पर कोई निगुरा बैठ जाता है वो स्थान गन्दा हो जाता है !
यह सुनकर नारद जी ने कहा हे भगवान आपकी बात सत्य है पर मै गुरु किसे बनाऊ ! विष्णु जी बोले हे नारद धरती पर चले जाओ जो व्यक्ति सबसे पहले मिले उसे अपना गुरु मानलो !
नारद जी ने प्रणाम किया और चले गए ! जब नारद जी धरती पर आये तो उन्हें सबसे पहले एक मछली पकड़ने वाला एक मछुवारा मिला ! नारद जी वापिस विष्णु जी के पास चले गए और कहा महाराज वो मछुवारा तो कुछ भी नहीं जानता मै उसे गुरु कैसे मान सकता हूँ !
यह सुनकर विष्णु जी ने कहा नारद जी अपना प्रण पूरा करो ! नारद जी वापिस आये और उस मछुवारे से कहा मेरे गुरु बन जाओ ! पहले तो मछुवारा नहीं माना बाद में बहुत मनाने से मान गया !
मछुवारे को राजी करने के बाद नारद जी वापीस विष्णु जी के पास गए और कहा हे विष्णु जी मेरे गुरूजी को तो कुछ भी नहीं आता वे मुझे क्या सिखायेगे ! यह सुनकर विष्णु जी को क्रोध आ गया और उन्होंने कहा हे नारद गुरु निंदा करते हो जाओ मै आपको श्राप देता हूँ कि आपको ८४ लाख योनियों में घूमना पड़ेगा !
यह सुनकर नारद जी ने दोनों हाथ जोड़कर कहा हे विष्णु जी इस श्राप से बचने का उपाय भी बता दीजिये ! विष्णु जी ने कहा इसका उपाय जाकर अपने गुरुदेव से पूछो ! नारद जी ने सारी बात जाकर गुरुदेव को बताई ! गुरूजी ने कहा ऐसा करना विष्णु जी से कहना ८४ लाख योनियों की तस्वीरे धरती पर बना दे फिर उस पर लेट कर गोल घूम लेना और विष्णु जी से कहना ८४ लाख योनियों में घूम आया मुझे माफ़ करदो आगे से गुरु निंदा नहीं करूँगा !
नारद जी ने विष्णु जी के पास जाकर ऐसा ही किया उनसे कहा ८४ लाख योनिया धरती पर बना दो और फिर उन पर लेट कर घूम लिए और कहा विष्णु जी मुझे माफ़ कर दीजिये आगे से कभी गुरु निंदा नहीं करूँगा ! यह सुनकर विष्णु जी ने कहा जिस गुरु की निंदा कर रहे थे उसी ने मेरे श्राप से बचा लिया !
गुरु की महिमा अपरम्पार है ! मैंने लोगो को कहते हुए सुना है कि गुरु पूरा होना चाहिए इसलिए वो ऐसे लोगो को गुरु बनाते है जिनका नाम बहुत बड़ा होता है जैसे निर्मम बाबा जिनके आगे पीछे लोगो कि भीड़ लगी होती है ! जिनके दर्शनों से भक्तो पर कृपा आने लगती है पर ऐसा कुछ नहीं होता !
कोई भी साधक कभी पूरा नहीं हो सकता क्योंकि पूरे तो केवल ईश्वर है और दूसरा ईश्वर कोई बन नहीं सकता ! इसलिए माना जाता है कि…
गुरु गूंगे गुरु बाबरे गुरु के रहिये दास
गुरु जो भेजे नरक नु स्वर्ग कि रखिये आस !
गुरु चाहे गूंगा हो चाहे गुरु बाबरा हो (पागल हो) गुरु के हमेशा दास रहना चाहिए ! गुरु यदि नरक को भेजे तब भी शिष्य को यह इच्छा रखनी चाहिए कि मुझे स्वर्ग प्राप्त होगा ! यदि शिष्य को गुरु पर पूर्ण विश्वास हो तो उसका बुरा स्वयं गुरु भी नहीं कर सकते !
गुरु ग्रन्थ साहिब में एक प्रसंग है कि एक पंडीत ने धन्ने भगत को एक साधारण पत्थर देकर कहा इसे भोग लगाया करो एक दिन भगवान कृष्ण दर्शन देगे ! उस धन्ने भक्त के विश्वास से एक दिन उस पत्थर से भगवान प्रकट हो गए ! गुरु तो केवल गुरु है फिर चाहे वे लोक गुरु हो या पंथक गुरु !

आखिर कौन होते हैं नागा साधू???? जाने उनका रहस्.......


क्यों सनातन धर्म की रक्षा के लिए आदिगुरु शंकराचार्य जी ने इन्हें बनाया था ?
अक्सर मुस्लिम और हिन्दू विरोधी नागा साधूओं की तस्वीर दिखा कर हिन्दु धर्म के साधूओं का अपमान करने की और हिन्दुओं को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं उन लोगों को नागा साधूओं का गौरवशाली इतिहास पता नहीं होता जानें नागा साधूओं का गौरवशाली इतिहास और उसकी महानता।
नागा साधूओं का इतिहास नागा साधु हिन्दू धर्मावलम्बी साधु हैं जो कि नग्न रहने तथा युद्ध कला में माहिर होने के लिये प्रसिद्ध हैं। ये विभिन्न अखाड़ों में रहते हैं जिनकी परम्परा आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा की गयी थी। नागा साधूओं का इतिहास भारतीय सनातन धर्म के वर्तमान स्वरूप की नींव आदिगुरू शंकराचार्य ने रखी थी। शंकर का जन्म ८वीं शताब्दी के मध्य में हुआ था जब भारतीय जनमानस की दशा और दिशा बहुत बेहतर नहीं थी। भारत की धन संपदा से खिंचे तमाम आक्रमणकारी यहाँ आ रहे थे।
कुछ उस खजाने को अपने साथ वापस ले गए तो कुछ भारत की दिव्य आभा से ऐसे मोहित हुए कि यहीं बस गए, लेकिन कुल मिलाकर सामान्य शांति-व्यवस्था बाधित थी। ईश्वर, धर्म, धर्मशास्त्रों को तर्क, शस्त्र और शास्त्र सभी तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। ऐसे में शंकराचार्य ने सनातन धर्म की स्थापना के लिए कई कदम उठाए जिनमें से एक था देश के चार कोनों पर चार पीठों का निर्माण करना।
यह थीं गोवर्धन पीठ, शारदा पीठ, द्वारिका पीठ और ज्योतिर्मठ पीठ। इसके अलावा आदिगुरू ने मठों-मन्दिरों की सम्पत्ति को लूटने वालों और श्रद्धालुओं को सताने वालों का मुकाबला करने के लिए सनातन धर्म के विभिन्न संप्रदायों की सशस्त्र शाखाओं के रूप में अखाड़ों की स्थापना की शुरूआत की। नागा साधूओं का इतिहास आदिगुरू शंकराचार्य को लगने लगा था सामाजिक उथल-पुथल के उस युग में केवल आध्यात्मिक शक्ति से ही इन चुनौतियों का मुकाबला करना काफी नहीं है।
उन्होंने जोर दिया कि युवा साधु व्यायाम करके अपने शरीर को सुदृढ़ बनायें और हथियार चलाने में भी कुशलता हासिल करें। इसलिए ऐसे मठ बने जहाँ इस तरह के व्यायाम या शस्त्र संचालन का अभ्यास कराया जाता था, ऐसे मठों को अखाड़ा कहा जाने लगा। आम बोलचाल की भाषा में भी अखाड़े उन जगहों को कहा जाता है जहां पहलवान कसरत के दांवपेंच सीखते हैं। कालांतर में कई और अखाड़े अस्तित्व में आए। शंकराचार्य ने अखाड़ों को सुझाव दिया कि मठ, मंदिरों और श्रद्धालुओं की रक्षा के लिए जरूरत पडऩे पर शक्ति का प्रयोग करें। इस तरह बाह्य आक्रमणों के उस दौर में इन अखाड़ों ने एक सुरक्षा कवच का काम किया।
कई बार स्थानीय राजा-महाराज विदेशी आक्रमण की स्थिति में नागा योद्धा साधुओं का सहयोग लिया करते थे। इतिहास में ऐसे कई गौरवपूर्ण युद्धों का वर्णन मिलता है जिनमें ४० हजार से ज्यादा नागा योद्धाओं ने हिस्सा लिया। अहमद शाह अब्दाली द्वारा मथुरा-वृन्दावन के बाद गोकुल पर आक्रमण के समय नागा साधुओं ने उसकी सेना का मुकाबला करके गोकुल की रक्षा की।
नागा साधू नागा साधुओं की लोकप्रियता है। संन्यासी संप्रदाय से जुड़े साधुओं का संसार और गृहस्थ जीवन से कोई लेना-देना नहीं होता। गृहस्थ जीवन जितना कठिन होता है उससे सौ गुना ज्यादा कठिन नागाओं का जीवन है।
यहां प्रस्तुत है नागा से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी।
1. नागा अभिवादन मंत्र : ॐ नमो नारायण
2. नागा का ईश्वर : शिव के भक्त नागा साधु शिव के अलावा किसी को भी नहीं मानते। *नागा वस्तुएं : त्रिशूल, डमरू, रुद्राक्ष, तलवार, शंख, कुंडल, कमंडल, कड़ा, चिमटा, कमरबंध या कोपीन, चिलम, धुनी के अलावा भभूत आदि।
3. नागा का कार्य : गुरु की सेवा, आश्रम का कार्य, प्रार्थना, तपस्या और योग क्रियाएं करना।
4. नागा दिनचर्या : नागा साधु सुबह चार बजे बिस्तर छोडऩे के बाद नित्य क्रिया व स्नान के बाद श्रृंगार पहला काम करते हैं। इसके बाद हवन, ध्यान, बज्रोली, प्राणायाम, कपाल क्रिया व नौली क्रिया करते हैं। पूरे दिन में एक बार शाम को भोजन करने के बाद ये फिर से बिस्तर पर चले जाते हैं।
5. सात अखाड़े ही बनाते हैं नागा : संतों के तेरह अखाड़ों में सात संन्यासी अखाड़े ही नागा साधु बनाते हैं:- ये हैं जूना, महानिर्वणी, निरंजनी, अटल, अग्नि, आनंद और आवाहन अखाड़ा।
6. नागा इतिहास : सबसे पहले वेद व्यास ने संगठित रूप से वनवासी संन्यासी परंपरा शुरू की। उनके बाद शुकदेव ने, फिर अनेक ऋषि और संतों ने इस परंपरा को अपने-अपने तरीके से नया आकार दिया। बाद में शंकराचार्य ने चार मठ स्थापित कर दसनामी संप्रदाय का गठन किया। बाद में अखाड़ों की परंपरा शुरू हुई। पहला अखाड़ा अखंड आह्वान अखाड़ा’ सन् 547 ई. में बना।
7. नाथ परंपरा : माना जाता है कि नाग, नाथ और नागा परंपरा गुरु दत्तात्रेय की परंपरा की शाखाएं है। नवनाथ की परंपरा को सिद्धों की बहुत ही महत्वपूर्ण परंपरा माना जाता है। गुरु मत्स्येंद्र नाथ, गुरु गोरखनाथ साईनाथ बाबा, गजानन महाराज, कनीफनाथ, बाबा रामदेव, तेजाजी महाराज, चौरंगीनाथ, गोपीनाथ, चुणकरनाथ, भर्तृहरि, जालन्ध्रीपाव आदि। घुमक्कड़ी नाथों में ज्यादा रही।
8. नागा उपाधियां : चार जगहों पर होने वाले कुंभ में नागा साधु बनने पर उन्हें अलग अलग नाम दिए जाते हैं। इलाहाबाद के कुंभ में उपाधि पाने वाले को 1.नागा, उज्जैन में 2.खूनी नागा, हरिद्वार में 3.बर्फानी नागा तथा नासिक में उपाधि पाने वाले को 4.खिचडिया नागा कहा जाता है। इससे यह पता चल पाता है कि उसे किस कुंभ में नागा बनाया गया है। उनकी वरीयता के आधार पर पद भी दिए जाते हैं। कोतवाल, पुजारी, बड़ा कोतवाल, भंडारी, कोठारी, बड़ा कोठारी, महंत और सचिव उनके पद होते हैं। सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण पद सचिव का होता है।
10. कठिन परीक्षा : नागा साधु बनने के लिए लग जाते हैं 12 वर्ष। नागा पंथ में शामिल होने के लिए जरूरी जानकारी हासिल करने में छह साल लगते हैं। इस दौरान नए सदस्य एक लंगोट के अलावा कुछ नहीं पहनते। कुंभ मेले में अंतिम प्रण लेने के बाद वे लंगोट भी त्याग देते हैं और जीवन भर यूं ही रहते हैं।
11. नागाओं की शिक्षा और ‍दीक्षा : नागा साधुओं को सबसे पहले ब्रह्मचारी बनने की शिक्षा दी जाती है। इस परीक्षा को पास करने के बाद महापुरुष दीक्षा होती है। बाद की परीक्षा खुद के यज्ञोपवीत और पिंडदान की होती है जिसे बिजवान कहा जाता है। अंतिम परीक्षा दिगम्बर और फिर श्रीदिगम्बर की होती है। दिगम्बर नागा एक लंगोटी धारण कर सकता है, लेकिन श्रीदिगम्बर को बिना कपड़े के रहना होता है। श्रीदिगम्बर नागा की इन्द्री तोड़ दी जाती है।
12. कहां रहते हैं नागा साधु : नाना साधु अखाड़े के आश्रम और मंदिरों में रहते हैं। कुछ तप के लिए हिमालय या ऊंचे पहाड़ों की गुफाओं में जीवन बिताते हैं। अखाड़े के आदेशानुसार यह पैदल भ्रमण भी करते हैं। इसी दौरान किसी गांव की मेर पर झोपड़ी बनाकर धुनी रमाते हैं।

नागा साधू बनने की प्रक्रिया. नागा साधु बनने की प्रक्रिया कठिन तथा लम्बी होती है।
नागा साधुओं के पंथ में शामिल होने की प्रक्रिया में लगभग छह साल लगते हैं। इस दौरान नए सदस्य एक लंगोट के अलावा कुछ नहीं पहनते। कुंभ मेले में अंतिम प्रण लेने के बाद वे लंगोट भी त्याग देते हैं और जीवन भर यूँ ही रहते हैं। कोई भी अखाड़ा अच्छी तरह जाँच-पड़ताल कर योग्य व्यक्ति को ही प्रवेश देता है। पहले उसे लम्बे समय तक ब्रह्मचारी के रूप में रहना होता है, फिर उसे महापुरुष तथा फिर अवधूत बनाया जाता है।
अन्तिम प्रक्रिया महाकुम्भ के दौरान होती है जिसमें उसका स्वयं का पिण्डदान तथा दण्डी संस्कार आदि शामिल होता है।[2] ऐसे होते हैं 17 श्रृंगार(नागा साधू) बातचीत के दौरान नागा संत ने कहा कि शाही स्नान से पहले नागा साधु पूरी तरह सज-धज कर तैयार होते हैं और फिर अपने ईष्ट की प्रार्थना करते हैं। नागाओं के सत्रह श्रृंगार के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि लंगोट, भभूत, चंदन, पैरों में लोहे या फिर चांदी का कड़ा, अंगूठी, पंचकेश, कमर में फूलों की माला, माथे पर रोली का लेप, कुंडल, हाथों में चिमटा, डमरू या कमंडल, गुथी हुई जटाएं और तिलक, काजल, हाथों में कड़ा, बदन में विभूति का लेप और बाहों पर रूद्राक्ष की माला 17 श्रृंगार में शामिल होते हैं। नागा साधू सन्यासियों की इस परंपरा मे शामील होना बड़ा कठिन होता है और अखाड़े किसी को आसानी से नागा रूप मे स्वीकार नहीं करते। वर्षो बकायदे परीक्षा ली जाती है जिसमे तप , ब्रहमचर्य , वैराग्य , ध्यान ,सन्यास और धर्म का अनुसासन तथा निस्ठा आदि प्रमुखता से परखे-देखे जाते हैं।
फिर ये अपना श्रध्या , मुंडन और पिंडदान करते हैं तथा गुरु मंत्र लेकर सन्यास धर्म मे दीक्षित होते है इसके बाद इनका जीवन अखाड़ों , संत परम्पराओं और समाज के लिए समर्पित हो जाता है, अपना श्रध्या कर देने का मतलब होता है सांसरिक जीवन से पूरी तरह विरक्त हो जाना , इंद्रियों मे नियंत्रण करना और हर प्रकार की कामना का अंत कर देना होता है कहते हैं की नागा जीवन एक इतर जीवन का साक्षात ब्यौरा है और निस्सारता , नश्वरता को समझ लेने की एक प्रकट झांकी है ।
नागा साधुओं के बारे मे ये भी कहा जाता है की वे पूरी तरह निर्वस्त्र रह कर गुफाओं , कन्दराओं मे कठोर ताप करते हैं । प्राच्य विद्या सोसाइटी के अनुसार “नागा साधुओं के अनेक विशिष्ट संस्कारों मे ये भी शामिल है की इनकी कामेन्द्रियन भंग कर दी जाती हैं”। इस प्रकार से शारीरिक रूप से तो सभी नागा साधू विरक्त हो जाते हैं लेकिन उनकी मानसिक अवस्था उनके अपने तप बल निर्भर करती है । विदेशी नागा साधू सनातन धर्म योग, ध्यान और समाधि के कारण हमेशा विदेशियों को आकर्षित करता रहा है लेकिन अब बडी तेजी से विदेशी खासकर यूरोप की महिलाओं के बीच नागा साधु बनने का आकर्षण बढ़ता जा रहा है।
उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर चल रहे महाकुंभ मेले में विदेशी महिला नागा साधू आकर्षण के केन्द्र में हैं। यह जानते हुए भी कि नागा बनने के लिए कई कठिन प्रक्रिया और तपस्या से गुजरना होता है विदेशी महिलाओं ने इसे अपनाया है। आमतौर पर अब तक नेपाल से साधू बनने वाली महिलाए ही नागा बनती थी। इसका कारण यह कि नेपाल में विधवाओं के फिर से विवाह को अच्छा नहीं माना जाता। ऐसा करने वाली महिलाओं को वहां का समाज भी अच्छी नजरों से भी नहीं देखता लिहाजा विधवा होने वाली नेपाली महिलाएं पहले तो साधू बनती थीं और बाद में नागा साधु बनने की कठिन प्रक्रिया से जुड़ जाती थी। नागा साधू कालांतर मे सन्यासियों के सबसे बड़े जूना आखाठे मे सन्यासियों के एक वर्ग को विशेष रूप से शस्त्र और शास्त्र दोनों मे पारंगत करके संस्थागत रूप प्रदान किया ।
उद्देश्य यह था की जो शास्त्र से न माने उन्हे शस्त्र से मनाया जाय । ये नग्ना अवस्था मे रहते थे , इन्हे त्रिशूल , भाला ,तलवार,मल्ल और छापा मार युद्ध मे प्रशिक्षिण दिया जाता था । इस तरह के भी उल्लेख मिलते हैं की औरंगजेब के खिलाफ युद्ध मे नागा लोगो ने शिवाजी का साथ दिया था नागा साधू जूना के अखाड़े के संतों द्वारा तीनों योगों- ध्यान योग , क्रिया योग , और मंत्र योग का पालन किया जाता है यही कारण है की नागा साधू हिमालय के ऊंचे शिखरों पर शून्य से काफी नीचे के तापमान पर भी जीवित रह लेते हैं, इनके जीवन का मूल मंत्र है आत्मनियंत्रण, चाहे वह भोजन मे हो या
फिर विचारों मे नागा साधू बात 1857 की है। पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल बज चुका था। यहां पर तो क्रांति की ज्वाला की पहली लपट 57 के 13 साल पहले 6 जून को मऊ कस्बे में छह अंग्रेज अफसरों के खून से आहुति ले चुकी थी। एक अप्रैल 1858 को मप्र के रीवा जिले की मनकेहरी रियासत के जागीरदार ठाकुर रणमत सिंह बाघेल ने लगभग तीन सौ साथियों को लेकर नागौद में अंग्रेजों की छावनी में आक्रमण कर दिया। मेजर केलिस को मारने के साथ वहां पर कब्जा जमा लिया।

इसके बाद 23 मई को सीधे अंग्रेजों की तत्कालीन बड़ी छावनी नौगांव का रुख किया। पर मेजर कर्क की तगड़ी व्यूह रचना के कारण यहां पर वे सफल न हो सके। रानी लक्ष्मीबाई की सहायता को झांसी जाना चाहते थे पर उन्हें चित्रकूट का रुख करना पड़ा। यहां पर पिंडरा के जागीरदार ठाकुर दलगंजन सिंह ने भी अपनी 1500 सिपाहियों की सेना को लेकर 11 जून को 1958 को दो अंग्रेज अधिकारियों की हत्या कर उनका सामान लूटकर चित्रकूट का रुख किया। यहां के हनुमान धारा के पहाड़ पर उन्होंने डेरा डाल रखा था, जहां उनकी सहायता नागा साधु-संत कर रहे थे।
लगभग तीन सौ से ज्यादा नागा साधु क्रांतिकारियों के साथ अगली रणनीति पर काम कर रहे थे। तभी नौगांव से वापसी करती ठाकुर रणमत सिंह बाघेल भी अपनी सेना लेकर आ गये। इसी समय पन्ना और अजयगढ़ के नरेशों ने अंग्रेजों की फौज के साथ हनुमान धारा पर आक्रमण कर दिया। तत्कालीन रियासतदारों ने भी अंग्रेजों की मदद की। सैकड़ों साधुओं ने क्रांतिकारियों के साथ अंग्रेजों से लोहा लिया। तीन दिनों तक चले इस युद्ध में क्रांतिकारियों को मुंह की खानी पड़ी।
ठाकुर दलगंजन सिंह यहां पर वीरगति को प्राप्त हुये जबकि ठाकुर रणमत सिंह गंभीर रूप से घायल हो गये। करीब तीन सौ साधुओं के साथ क्रांतिकारियों के खून से हनुमानधारा का पहाड़ लाल हो गया। महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के अधिष्ठाता डा. कमलेश थापक कहते हैं कि वास्तव में चित्रकूट में हुई क्रांति असफल क्रांति थी।
यहां पर तीन सौ से ज्यादा साधु शहीद हो गये थे। साक्ष्यों में जहां ठाकुर रणमतिसह बाघेल के साथ ही ठाकुर दलगंजन सिंह के अलावा वीर सिंह, राम प्रताप सिंह, श्याम शाह, भवानी सिंह बाघेल (भगवान् सिंह बाघेल ), सहामत खां, लाला लोचन सिंह, भोला बारी, कामता लोहार, तालिब बेग आदि के नामों को उल्लेख मिलता है
वहीं साधुओं की मूल पहचान उनके निवास स्थान के नाम से अलग हो जाने के कारण मिलती नहीं है। उन्होंने कहा कि वैसे इस घटना का पूरा जिक्र आनंद पुस्तक भवन कोठी से विक्रमी संवत 1914 में राम प्यारे अग्निहोत्री द्वारा लिखी गई पुस्तक 'ठाकुर रणमत सिंह' में मिलता है।
इस प्रकार मैं दावे के साथ कह सकता हु की नागा साधू सनातन के साथ साथ देश रक्षा के लिए भी अपने प्राणों की आहुति देते आये है और समय आने पर फिर से देश और धर्म के लिए अपने प्राणों की आहुति दे सकते है ...पर कुछ पुराव्ग्राही बन्धुओ को नागाओ का यह त्याग और बलिदान क्यों नहीं दिखाई देता है ?

सूतपुत्र कर्ण की प्रेम कहानी की नायिका थीं द्रौपदी !

महाभारत युग हिन्दू धर्म के इतिहास का एक अहम समय है, जिसने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। इस ग्रंथ में अनेक कथाएं हैं जिन्हें गहराई से जान कर आज भी मनुष्य चकित हो जाता है। इससे भी ज्यादा अचंभित करते हैं इन कथाओं में छिपे अनजान तथ्य। ऐसे ही कुछ तथ्य जुड़े हैं पांच पांडवों की पत्नी पांचाली यानी कि द्रौपदी के स्वयंवर से। पांचाल के राजा द्रुपद की पुत्री, पांचाली या द्रौपदी का स्वयंवर महाभारत का एक अहम अध्याय है जिसके बाद इस युग ने एक अलग मोड़ युग ने एक अलग मोड़ लिया था। पांचाल में हुए इस स्वयंवर में ना केवल पांडव मौजूद थे बल्कि कर्ण भी उपस्थित थे, लेकिन पांचाली द्वारा कर्ण को ठुकराया गया था। ऐसा नहीं था कि कर्ण किसी भी रूप में असमर्थ थे, लेकिन पांचाली की पसंद तो केवल अर्जुन ही थे। लेकिन  यदि पांचाली  ऐसा ना करतीं तो महाभारत युग में उनकी कहानी कुछ और ही होती। शायद जिन मुश्किलों से वो गुजरी हैं उन्हें कभी भी उनका सामना ना करना पड़ता। महाभारत के कुछ तथ्य यह सबित करते हैं कि यदि द्रौपदी का विवाह पांडवों से ना होकर कर्ण से होता तो वह ज्यादा सुखमय जीवन व्यतीत करतीं।




लेकिन कैसे, आइए जानते हैं द्रौपदी के पिता  राजा द्रुपद ने अपनी पुत्री का विवाह  राजकुमार अर्जुन से करने का फैसला किया  लेकिन वर्णावर्त में पांडवों की मृत्यु हो जाने जैसी बात सुनकर महाराज द्रुपद ने अपनी बेटी के विवाह के लिए स्वयंवर रचने की योजना बनाई। इस स्वयंवर में मीलों दूर से विभिन्न राज्यों के बुद्धिमान तथा कुशल राजा बुलाए गए। स्वयंवर में पांच पांडवों को भी बुलाया गया लेकिन इसके अलावा कर्ण भी इस स्वयंवर में उपस्थित हुए। कहा जाता है कि कर्ण तहे दिल से द्रौपदी को पसंद करते थे इसलिए उन्हें अपनी पत्नी बनाना चाहते थे। महाराज द्रुपद के अनुसार स्वंम्बर में एक शर्त राखी हुई थी जिसमे सभा  में मौजूद वीरो को एक कार्य सौंपा गया था द्रुपद  बोले ,“जो भी वीर सामने रखे धनुष को उठाकर उसे बांधकर ऊपर ऊंचाई पर बंधी मछली की आंख में पहली बार तीर चलाएगा, वही मेरी पुत्री द्रौपदी से विवाह करने के लायक होगा। यह प्रतिस्पर्धा इतनी आसान नहीं थी जितना बताया गया था। कार्य  में दिया गया धनुष एक खास धातु    से बनाया गया था, जिस कारण उसका वजन इतना ज्यादा था कि उसे उठाने के लिए शायद एक विशाल हाथी की जरूरत भी पड़ती। इसके अलावा ऊपर बंधी मछली की आंख में निशाना लगाने के लिए ठीक नीचे एक बर्तन में भरे गए पानी में आ रही परछाई की सहायता लेनी थी। इस परछाई की मदद से ही निशाना लगाना था। इसके अलावा यह शर्त थी कि कोई भी उम्मीदवार एक से ज्यादा बाण का इस्तेमाल नहीं कर सकता था। पांचालीकोयह यकीन था कि स्वयंवर में अर्जुन के अलावा अन्य कोई भी व्यक्ति बेशक  शामिल किए गए भारी धनुष को उठाने में सफल हो जाए, लेकिन मछली की आंख में सही निशाना नहीं लगा सकता है। पर उनकी परेशानी कर्ण की स्वयंवर में हुई उपस्थिति ने बढ़ा दी। माना जाता है कि कर्ण धनुष बाण चलाने में अर्जुन से भी ज्यादा कुशल थे। इसलिए वह आसानी से पांचाली को स्वयंवर में जीत सकते थे। लेकिन दूसरी ओर द्रौपदी तो केवल अर्जुन को ही अपने जीवन साथी के रूप में देख रही थी।



इसलिए अंत में पांचाली ने भरी सभा में कर्ण को लज्जित किया। उसने ऊंची आवाज में कहा, “मैं एक सूत पुत्र से कभी विवाह नहीं करूंगी”। यह सुन सभा में मौजूद हर एक व्यक्ति कर्ण का मजाक बनाते हुए ठहाकों के साथ हंसने लगा। कर्ण यह अपमान बर्दाश्त ना कर सके और वहां से चले गए। इसके बाद राजकुमार अर्जुन ने ही धनुष बाण पर नियंत्रण पा कर मछली की आंख में सही निशाना लगाया और पांचाली को स्वयंवर में जीत लिया। लेकिन पांचाली की दुविधा यहां समाप्त नहीं हुई। अंत में उसे केवल अर्जुन ही नहीं बल्कि उसके साथ अन्य चार पांडु भाइयों - युधिष्ठर, भीम, नकुल और सहदेव की भी पत्नी बनना पड़ा। वह सभी को पति होने का बराबर दर्जा देती और पांचों भाइयों के साथ संभोग करने के लिए भी बांटी जाती। यदि स्वयंवर में द्रौपदी का विवाह कर्ण से हो जाता तो उसे कभी भी किसी के लिए विभाजित होने की आवश्यकता ना होती। इंतना ही नहीं  अपने स्वामी में जिन गुणों को द्रौपदी ढूंढ़ती थी वे उन्हें पांच पांडवों में मिले तो जरूर लेकिन अलग अलग रूप में। जहां युधिष्ठिर अपने सिद्धांतों के लिए जाने जाते थे वहीं दूसरी ओर भीम बलशाली थे और अर्जुन महान धनुर्धर थे। इसके अलावा नकुल अपने शारीरिक आकर्षण के   लिए जाने जाते थे और सहदेव को अच्छी सूझबूझ के लिए माना जाता था। दूसरी ओर यह सभी  गुण अकेले कर्ण में मौजूद थे। कर्ण भीम की   तरह ताकतवर होने के साथ  साथ अर्जुन की तरह   धनुष विद्या में बेहद कुशल भी थे। केवल कुशल ही नहीं बल्कि कई बार उन्हें अर्जुन से ज्यादा सक्षम माना गया। वे काफी समझदार, आकर्षक और नैतिक मूल्यों से भरपूर थे। यह विशेषताएं कर्ण को पांच पाण्डवों से ज्यादा सक्षम तो बनाती हैं लेकिन पांचाली की किस्मत को कुछ और ही मंजूर था जहां उन्हें विभिन्न दुखों को भोगना पड़ा।


पांच पाण्डवों से शादी कर के द्रौपदी जहां एक बड़े राज्य की महारानी कहलाईं वहीं हर कदम पर अपमान ने भी उनका रास्ता रोकने की कोशिश की। सबसे पहला अपमान था पांच पुरुषों की एक अकेली पत्नी होने का। हिन्दू मान्यताओं में एक ऐसी स्त्री जिसके एक से ज्यादा पति हों, उसके चरित्र पर ढेरों अंगुलियां उठाई जाती हैं, लेकिन फिर भी इसे संयोग ही कहें कि इसी हिन्दू इतिहास में एक स्त्री के पांच पति हुए। पांच पतियों पत्नी होने की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी पांचाली को। वह अपने सुख-दुख जहां हर एक पति से बांटतीं वहीं हर एक पति को बराबर   का समय देने के लिए भी मजबूर थीं द्रौपदी। वेद व्यास द्वारा पांचाली को एक वरदान दिया गया था कि उनका कौमार्य कभी भी भंग नहीं होगा। वे हर बार जिस भी पति से शारीरिक संबंध बनाएगी, अंत में उनका कौमार्य वापस लौट आएगा अर्थात वे हमेशा पवित्र ही रहेंगी। लेकिन इसी के साथ ही व्यास द्वारा प्रत्येक पति को समय देने के लिए भी पांचाली का विभाजन किया गया था। कुछ माह अथवा वर्षों के लिए किसी एक पांडव के साथ रहने के लिए विवश थीं पांचाली। और फिर वह समय समाप्त होने पर उन्हें अन्य पाण्डव के पास भेज दिया जाता था। इस बीच कोई भी दूसरा पाण्डव भाई उन पर नजर नहीं रख सकता था।


यह पांचाली के लिए अपमान के समान था लेकिन समय के  सामने उन्हें झुकना ही पड़ा। पांचालीकी पहली पसंद केवल राजकुमार अर्जुन थे लेकिन उन्हें पांच भाइयों की पसंद बनना पड़ा। लेकिन यदि उनका विवाह कर्ण से हो जाता तो उन्हें इस अनादर का सामना ना करना पड़ता। कर्ण कभी चाह कर भी अपनी पत्नी को किसी अन्य के साथ ना बांटते। वे स्वयं पांचाली को खुश रखने का   हर संभव प्रयास करते और उन्हें एक सुखमय जीवन प्रदान करने का वायदा करते।दूसरी तरफ द्रौपदी के मन में केवल अर्जुन राज करते थे लेकिन अर्जुन के मन में श्री कृष्ण की बहन सुभद्रा ने जगह बना ली थी। अर्जुन जिन्हें अपनी पत्नी द्रौपदी को दूसरे भाइयों के साथ बांटने का दुख सताता था उन्होंने सुभद्रा को अपनी प्रिय पत्नी का दर्जा दिया। अर्जुन-सुभद्रा के विवाह का दर्द द्रौपदी के लिए सबसे बड़ा था। लेकिन अगर द्रौपदी का विवाह कर्ण से होता तो कर्ण के लिए केवल द्रौपदी ही उनकी प्रिय होतीं।

यदि पांचाली का कर्ण से विवाह होता तो शायद उन्हें कभी भरी सभा में लज्जित ना किया जाता। वह पांडव ही थे जिनके कारण द्रौपदी का चीर हरण संभव हुआ। पांच पति होने के बावजूद भी द्रौपदी की रक्षा करने वाला उस समय कोई ना था। केवल एक श्रीकृष्ण ही थे जिन्होंने द्रौपदी को अपनी बहन मानते हुए उनकी रक्षा की औरसभा में अपमानित होने से बचाया। यह बात सत्य है की कौरवों तथा पांडवों के बीच हुए जुए के उस खेल में कौरवों द्वारा षडयंत्र रचा गया था। पांडव किस दिशा की ओर जा रहे थे उन्हें इस बात का अंदाजा भी ना था। लेकिन यह उनकी भूल थी कि एक खेल के चक्कर में उन्होंने अपनी पत्नी तक को दांव पर लगा दिया। दूसरी ओर इस बात को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि सभा में कर्ण भी कौरवों के साथ ही थे। कर्ण भी द्रौपदी का चीरहरणहोने से रोक ना सके बल्कि सभा में पांडवों को अपने कटु वचन से अपमानित करने का हर संभव प्रयास करते रहे। उस क्षण पांचाली को यह आभास हुआ कि उनके स्वयंवर के दौरान उन्होंने कर्ण को अपमानित किया था इसीलिए कर्ण इस बात का बदला ले रहे हैं, लेकिन बाद में  भगवान कृष्ण ने द्रौपदी को समझाया कि कर्ण के कटु वचन पांडवों की सोई हुई आत्मा को जगाने के  लिए थे। वे चाहते थे की कम से कम उनकी बुरी बातों का ही पांडवों के अहंकार पर असर हो जाए और वे उठकर अपनी पत्नी को बचाने का संघर्ष करें, लेकिन ऐसा हो ना सका। जब द्रौपदी को यह बात पता चली तो उन्हें एक समय के लिए काफी बुरा लगा। कहा जाता है कि अर्जुन कोसुभद्रा की ओर जाता देख द्रौपदी का मन काफी उदास हो गया था और दूसरी ओर कर्ण की सच्चाई जानकर उनके मन में कर्ण के लिए अच्छाई आ गई थी। लेकिन यह बात कितनी सच है यह कोई नहीं जानता।




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